दिवाली एक उम्मीद अंधकार मिटाने की। हजारों साल से इस उम्मीद के पूरा होने की राह ताक रहे हम, हर ओर जाहिरया उजाला ही उजाला दिखता है पर ये अंधकार घटने की बजाय बढ़ता ही जाता है। अंधकार रूपी कुरीतियां कम हुई क्या ? जातिवाद कम हुआ क्या ? हम नारी का सम्मान करने वाले सभ्य नागरिक बने क्या?
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