Hindi JOURNALISM DAY : कोरोना की बड़ी चोट हिंदी पत्रकारिता पर


  • कोरोना काल में अर्थव्यवस्था पर चोट भारी पड़ी है हिन्दी पत्रकारिता पर




लखनऊ। कोरोना संकट के इस दौर में अर्थव्यवस्था पर पड़ी चोट ने पहले से ही तमाम संकटों से जूझ रही हिन्दी पत्रकारिता को खासा नुकसान पहुंचाया है। हालांकि बड़े बाजार और निरंतर प्रगति कर रही हिन्दी पत्रकारिता का आने वाला दौर बेहतर होने की उम्मीद बरकरार है। हिन्दी पत्रकारिता दिवस के मौके पर शनिवार को इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्लूजे) की ओर कोरोना काल में हिन्दी पत्रकारिता से सामने चुनौतियां विषय पर आयोजित वेबिनार में संगठन के प्रधान महासचिव परमानंद पांडे ने कहा कि निस्संदेह अर्थव्यवस्था पर चोट ने पहले से नाजुक रहे मीडिया सेक्टर और खासकर हिन्दी व भाषाई पत्रकारिता को भारी नुकसान पहुंचाया जिसका नतीजा बड़े पैमाने पर छंटनी और वेतन कटौती के रुप में देखने को मिल रहा है। हालांकि उनका कहना है कि हिन्दी पत्रकारिता पहले की तरह इस खतरे से भी उबरेगी और बेहतर दिशा में कदम बढ़ाएगी। इस वेबिनार का आयोजन आईएफडब्लूजे के साथ बीते 22 सालों से अनवरत प्रकाशित हो रही हिन्दी मासिक पत्रिका मीडिया मंच ने मिल कर किया था। इस मौके पर मीडिया मंच के 22 साल पूरे होने पर प्रकाशित अंक का विमोचन भी किया गया।

वेबिनार में बोलते हुए हिन्दी दैनिक आज समाज के संपादक अजय शुक्ला ने कहा कि सच की ताकत और विश्वसनीयता ही हिन्दी पत्रकारिता को बचाएगी। दैनिक भास्कर मुंबई से विजय सिंह ने कहा कि संकट काल में भी हिन्दी पत्रकारिता ने बेहतर काम कर दिखाया है और जनता तक सही बीतें पहुंचाई हैं। राष्ट्रीय सहारा के देवकीनंदन मिश्रा ने कहा कि कोरोना जैसे संकट हिन्दी पत्रकारिता को और भी निखारेंगे और जरुरत अपनी विश्वसनीयता को बचाने और जनपक्षधर होने की है।

वेबिनार मे अपनी बात रखते हुए वरिष्ठ पत्रकार राजीव ओझा ने कहा कि हिन्दी का बड़ा बाजार है और आज हिन्दी के लेखकों की भारी मांग है। उन्होंने कहा कि बड़ा पाठक वर्ग व बाजार हिन्दी को संकट से बाहर लाएगा। आईएफडब्लूजे के उपाध्यक्ष व मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार केएम झा ने कहा कि जिन भी मीडिया हाउसों में पत्रकारों की नौकरियां गयी हैं या वेतन कटौती हो रही वहां उनके संगठन ने विरोध किया है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था में मंदी की आड़ लेकर बहुत से मीडिया हाउस अपने खर्चे कम करने में जुटे हैं और गाज पत्रकारों पर गिर रही है। डीएनए, नवभारत टाइम्स सहित सहित कई अंग्रजी व हिन्दी अखबारों में काम कर चुकी व वर्तमान में स्वतंत्र पत्रकारिता कर रही कंचन श्रीवास्तव ने कहा कि अर्थ का संकट तो हिन्दी मीडिया में हमेशा से रहा है। बड़ा पाठक वर्ग होने के बाद भी हिन्दी पत्रकारिता का आर्थिक पक्ष कमजोर रहता है जो दुखद है। आदिवासी क्षेत्रों की समस्याओं पर मुखर पत्रकार व लेखक विजय शंकर चतुर्वेदी ने हिन्दी पत्रकारिता दिवस के मौके पर सभी को शुभकामनाएं दी।

इस मौके पर बोलते हुए आईएफडब्लूजे के वरिष्ठ उपाध्यक्ष व उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने कहा कि संकट के इस दौर में संगठन ने मई महीने में ही तीन वेबिनार का आयोजन कर पत्रकारों की समस्याओं से खुद को जोड़ा है। उन्होंने मीडिया मंच की सराहना करते हुए कहा कि बिना किसी बड़े उद्योग घराने के सहयोग के यह पत्रिका अनवरत 22 साल से प्रकाशित हो रही है और जनता की आवाज उठा रही है। उन्होंने इस मौके पर मीडिया मंच के 22 साला अंक का विमोचन भी किया। मीडिया मंच के संपादक टीबी सिंह ने  कहा कि आर्थिक संकटों के बीच भी पत्रिका का प्रकाशन दुष्कर काम था पर लोगों से सहयोग से इसे पूरा किया गया।

वेबिनार में वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शुक्ला दादा, मुकुल मिश्रा, राजेश मिश्रा, अजय त्रिवेदी, बिहार से सुधांशु कुमार, मुरादाबद से संतोष गुप्ता, दिल्ली से सीके पांडे, सिद्धार्थ कलहंस सहित 42 पत्रकार मौजूद रहे।

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