"गांव में मां का आंचल" राजेन्द्र मौर्य गांव में घर का चौबारा, खुला आसमां खिली धूप, हर ओर खुशी, गम का न दूर तक कोई ठिकाना । चेहरों पर हंंसी की लालिमा, देखते ही उछल रहे बच्चे ।। मेहमान आया है, खुशियों का खजाना लाया है। देख मां अपने बेटे को खुशी के आंसू बहाने लगती है। क्या तुझको कभी मां-बाप की याद नहीं आती है।। हम तो दिन में हर क्षण तुझे याद करते हैं। तेरा कैसा दिल, जो मां-बाप को कभी याद नहीं करता है। बेटा बोला, फुर्सत नहीं, बस हर वक्त काम की फिक्र रहती है।। हर रोज सोचता हूं अब रोजाना करूंगा मां-बाप से बात। पूछूंगा उनका हालचाल, लेकिन काम से नहीं होती फुर्सत। सुबह सूरज उगता जरूर घर की छत से देखता हूं।। शाम को घर की छत से सूरज छिपते देखे एक जमाना हो गया। गांव मां-बाप की छांव में यही तमन्ना लेकर आया हूं। जब तक हूं रोज सुबह-शाम घर के चौबारे से देखूंगा सूरज को। मां के हाथ से कच्चे चूल्हे पर बनी रोटी खाऊंगा । चाय पिऊंगा गुड़ क...
एक अद्भुत स्वाधीनता सेनानी के. विक्रम राव आजादी के अमृत महोत्सव पर आज (11 नवम्बर) उनकी जयन्ती पर एक बांका योद्धा याद आया। वह त्रासदी का पर्याय था। शेक्सपियर के शोकान्तक नाटक के नायक के सदृश। उसने दो सदियां देखीं। उन्नीसवीं और बीसवीं। अपनी जन्मसती के ठीक सात साल पूर्व ही विदाई ले ली थी। पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़ा। फिर जिन्ना से और अंत में इंदिरा गांधी के आपातकालीन सत्ता के विरुद्ध। अलबेला था। नाम था आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी। ठीक स्वतंत्रता के वर्ष (1947) में राष्ट्रीय कांग्रेस के वे अध्यक्ष थे। बापू के साथ विभाजन की पुरजोर खिलाफत की थी। अपनी जन्मभूमि (सिंध) गवां दीं। इसके लिये जवाहरलाल नेहरु को उन्होंने कभी भी क्षमा नहीं किया। इस सिंधीभाषी सोशलिस्ट राष्ट्रनायक की बांग्लाभाषी कांग्रेसी पत्नी सुचेता (मजूमदार) कृपलानी उत्तर प्रदेश की चौथी तथा भारत की प्रथम महिला मुख्यमंत्री रहीं। संविधान निर्मात्री सभा की प्रथम बैठक पर वंदे मातरम् गाया था। आज अपने छह दशक के छात्र ...
आज बाबा गुरुनानक देव का 550वां प्रकाशोत्सव है, असल में बाबा ने किसी पंथ का प्रारंभ नहीं किया था- वह तो एक विचार थे -- सारी दुनिया में उस समय भी धर्म-पन्थ के नाम पर टकराव था- बाबा नानक अपनी चार उदासियीं में कोई २४ हज़ार किलोमीटर दुनिया दे दो महाद्वीप के चप्पे चप्पे पर गए -- हर मत को मानने वाले पीर- पुजारी- संत - फकीर- सूफी से मिले और सभी को इस बात के लिए सहमत किया कि भले ही आपका जन्म और विशवास किसी भी धर्म में हो-- सर्वशक्ति एक ही - एक नाम ओंकार --- . यही नहीं उन्होंने सभी पंथों के बीच सतत संवाद की अनिवार्यता को भी स्थापित किया . बाबा नानक एक आम किसान की ही तरह अपना जीवन बिताते रहे , अभी करतारपुर साहेब में वह राहत देखि जा सकती है जिससे वे खुद अपने खेतों को सींचते थे . इस बार का गुरु पर्व महज ५५० साल के लिए याद नहीं रखा जाएगा- देख लेना- बाबा नानक ने इस दिन के रास्ते दोनों मुल्कों का राब्का खोल दिया है , ज़रा उन लोगों से मिलें जो उस तरफ दर्शन कर आये हैं -- बूढी आँखे, उम्मीदों में सरहद पार से आये लगों में अपने पिंड, यादें, खेत, अपने पूर्वजों की कब्रें खोजती हैं, इस तरफ के किसी ...
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