Mahatma Gandhi : गांधी जी की अंतिम इच्छा खारिज ही रही !!

  • गांधीजी की अंतिम इच्छा खारिज ही रही !!





        महात्मा गांधी के आखिरी निजी सचिव (महादेव देसाई के निधन के बाद) रहे वेंकटरामन कल्याणम की 99 वर्ष की आयु में गत मंगलवार (4 मई 2021) को चेन्नई में मृत्यु हो गयी। इससे बापू की बहुचर्चित वसीयत फिर सार्वजनिक विमर्श में आ गयी। गांधीजी ने 73 वर्ष पूर्व (29 जनवरी 1948) को एक दस्तावेजी बयान कल्याणम द्वारा टंकित कराया था। इसमें सुझाया था कि 63—वर्षीय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भंग कर लोक सेवा संघ के नाम से गठित किया जाये। वह दलगत राजनीति से परे जनकल्याण का माध्यम बने। यह बयान जवाहरलाल नेहरु तथा सरदार वल्लभभाई पटेल को अगले दिन देकर कांग्रेस के सम्मेलन में अनुमोदन हेतु पेश करना तथा क्रियान्वित करना था। सचिव प्यारे लाल जी को दायित्व सौंपा गया था कि वे इस दस्तावेज को प्रसारित करेंगे। मगर हत्यारे नाथूराम गोडसे की गोली ने राष्ट्रहित के इस प्रारुप को ही मिटा दिया। कांग्रेस पार्टी चुनावी सियासत के दलदल में धंसती रही। भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लक्ष्य के लिये रचित बापू की कार्य योजना की भ्रूणावस्था में ही हत्या हो गयी। नेहरु डेढ़ दशक तक प्रधानमंत्री बने रहे। पटेल की असामयिक मृत्यु हो गयी। वर्तमान कांग्रेस, जो कश्मीर से केरल तक असम से गुजरात तक एक छत्र शासन करती थी, का सफाया हो गया। आज बस तीन राज्यों (पंजाब, छत्तीसगढ़ और राजस्थान) में ही सिमट गयी।

         प्रथम लोकसभा (1952) में 364 सदस्यों से घटकर सत्रहवें में आज 49 सदस्यों की संख्या पर गिर गयी। मान्य विपक्ष का दर्जा भी छिन गया। कांग्रेस को लाभ बस इतना हुआ कि नेहरु के नाती की पत्नी, पुत्र और पुत्री अभी तक कांग्रेस के मालिक बने हुये हैं। महात्मा गांधी की वसीयत पर व्यंग के लहजे में भाजपायी टिप्पणी करते है कि वे ही राष्ट्रपिता की अंतिम इच्छा को पूरा करने में जुटे हैं। कांग्रेस—मुक्त भारत नरेन्द्र मोदी के जीवन का संपूर्ण ध्येय है।

        बापू की आशंका, अब अक्षरश: सही हुयी। सत्ता चखते ही त्याग में तपे ये उत्सर्गी पार्टीजन भ्रष्टाचारी हो जायेंगे। राजकोष की लूट, वंचितों का शोषण तथा गांव की उपेक्षा कर, शहरों का विकास होगा। जवाहरलाल नेहरु ने बापू को पत्र भी लिखा था (''बंच आफ ओल्ड लेटर्स'') कि अब उद्योग को प्राथमिकता मिलेगी। अर्थात बहुजन हितायवाला कुटीर उद्योग दोयम दर्जे पर जायेगा। तकली—चर्खा अब म्यूजियम में दिखेंगे। सेवाग्राम की कुटी में बापू ने इन महान नेताओं से संडास साफ कराया था। उनका अहंकार तोड़ने के लिये। दक्षिण अफ्रीका में तो अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी को बापू ने घर से निकाल दिया था, जब उन्होंने शौचालय धोने से मना कर दिया था। इन घटनाओं की सत्यता पर अब यकीन नहीं होता।

        अर्थात ये गांधीवादी पुरोधा, उत्सर्ग की आंच में तपे राजेन्द्र प्रसाद 102 कमरों वाले दैत्याकार राष्ट्रपति भवन में और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ब्रिटिश सेनाध्यक्ष जनरल क्लाड आचिनलेक के वृहत तीन मूर्ति भवन में तब बस गये थे। स्वदेशी की मान्यतायें धूमिल हो गयीं। जीवन के मूल्य बस शुभ—लाभ में बदल गये। 

गांधीजी की वसीयत का एक पहलू तो सही हुआ। भ्रष्टाचार बढ़ेगा, खूब बढ़ा। वीके कृष्णमेनन के लंदन में जीप घोटाले से सोनिया—कांग्रेस सरकार (मनमोहन सिंह) के अनगिनत घोटालों की सूची आम आदमी की जानकारी में है। इतिहासकारों के शोध का विषय है कि आखिर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भंग कर लोकसेवा संघ बनाने में इतनी हिचक गांधी के इन सिद्धांतवादी, त्यागी चेलों में क्यों गहरायी? 

         वह घटना याद आती है जब मौलाना अबुल कलाम आजाद के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव का प्रश्न उठा था। उस अवसर का वर्किंग कमेटी का दृश्य फिल्माया जा चुका है। बापू ने सदस्यों को सूचित किया कि सरदार पटेल के नाम को कई प्रदेश समितियों ने प्रस्तावित किया है। फिर बापू घूमे और बोले, ''जवाहर, तुम्हारे नाम का प्रस्ताव किसी राज्य ने भी नहीं किया।'' तनिक रुक कर बापू ने पटेल से कहा, ''सरदार, मैं चाहता हूं कि तुम जवाहर के पक्ष में अपना नाम वापस ले लो।'' और इतिहास की विडंबना थी कि इस बारडोली के सत्याग्रही ने केवल कहा : ''जी बापू''।  इन दो शब्दों ने आधुनिक भारतीय इतिहास ही बदल डाला। नेहरु वंश की नींव पड़ गयी। चालू है अभी तक।

         इतिहास से प्रश्न पूछा जा सकता है कि यदि सरदार पटेल बापू के प्रस्ताव को नकार कर कांग्रेस अध्यक्ष बन जाते? प्रधानमंत्री नियुक्त हो जाते? तो क्या होता ? आंकलन स्पष्ट है कि नेहरु उस पुरानी पार्टी कांग्रेस को तोड़ देते। वही हरकत जो उनकी इकलौती पुत्री ने तीन बार चुकी हैं। सिंडिकेट को हटाकर कांग्रेस इंडिकेट बनाया। कम्युनिस्ट सांसदों की बैसाखी पर केन्द्र सरकार चलायी। अपने कांग्रेसी प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डि को हराकर बागी निर्दलीय वीवी गिरी को राष्ट्रपति निर्वाचित करा दिया। एस. निजलिंगप्पा, देवराज अर्स, देवाकांत बरुझ, कासु ब्रह्मानन्द रेड्डि को बर्खास्त कर स्वयं पार्टी की सरबराह बन गयीं। पराकाष्ठा आई जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रायबरेली में भ्रष्ट आचरण के जुर्म में इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध करार दिया। प्रधानमंत्री ने कुर्सी के लिये आपातकाल लगा दिया। बाकी सब आज का जानामाना इतिहास है, हर एक को पता है।


*बापू की वसीयत — 29 जनवरी 1948।*


         ''भारत को सामाजिक, नैतिक व आर्थिक आजादी हासिल करना अभी बाकी है। भारत में लोकतंत्र के लक्ष्य की ओर बढ़ते समय सैनिक सत्ता पर लोकसत्ता के आधिपत्य के लिए संघर्ष होना अनिवार्य है। हमें कांग्रेस को राजनीतिक दलों और साम्प्रदायिक संस्थाओं की अस्वस्थ स्पर्धा से दूर रखना है। ऐसे ही कारणों से अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी मौजूदा संस्था को भंग करने और नीचे लिखे नियमों के अनुसार 'लोक सेवक संघ' के रूप में उसे विकसित करने का निश्चय करती है।''


         गांधीजी (बापू) की राय थी कि भारत की आजादी का लक्ष्य पूरा हो जाने के बाद राजनीतिक दल के रुप में कांग्रेस के बने रहने का अब कोई औचित्य नहीं है। अतएव इसे भंग करके लोक सेवक संघ बना देना चाहिए और कांग्रेस के नेताओं को सामाजिक कार्यों में जुट जाना चाहिए। गांधीजी ने अपनी हत्या के तीन दिन पहले यानी 27 जनवरी 1948 को एक नोट में लिखा था कि : ''अपने वर्तमान स्वरूप में कांग्रेस अपनी भूमिका पूरी कर चुकी है। अतएव इसे भंग करके एक लोकसेवक संघ में तब्दील कर देना चाहिए।'' यह नोट एक लेख के रूप में 2 फरवरी 1948 को ''महात्मा जी की अंतिम इच्छा और वसीयतनामा'' शीर्षक से ''हरिजन'' पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। अर्थात् गांधीजी की हत्या के दो दिन बाद यह लेख उनके सहयोगियों द्वारा प्रकाशित कराया गया था। यह शीर्षक गांधीजी की हत्या से दुःखी उनके सहयोगियों ने दे दिया था। इसी तरह से उन्होंने कांग्रेस का संविधान और स्वरुप दोनों बदल डालने की बाबत स्वयं एक मसौदा 29 जनवरी की रात को तैयार किया था, जिसे उनकी हत्या के बाद कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव आचार्य युगल किशोर (बाद में उत्तर प्रदेश के काबीना मंत्री) ने विभिन्न अखबारों को प्रकाशनार्थ जारी किया था। 


         मगर बापू की वसीयत कोई स्वीकार नहीं करता। यीशू मसीह ने सूली पर चढ़ते वक्त ईश्वर से कहा था, ''इन नासमझों को क्षमा कर दो। वे नहीं जानते वे क्या कर रहे हैं?'' बापू का उत्सर्ग अपरिहार्य था। गोडसे तो विधि का बहाना था। निजी सहायक वेंकटरामन कल्याणम का भावार्थ यही था। उनके निधन पर शोक संवेदना।


  • K Vikram Rao, Sr. Journalists
  • Mobile : 9415000909 
  • E-mail: k.vikramrao@gmail.com

Comments

Popular posts from this blog

Elon Musk become infamous by buying Twitter and removing the Indian CEO

Rajeshwari Maurya shat what Naman राजेश्वरी मौर्य: शत शत नमन

Amitabh Bachchan Admitted in Hospital, Jaya Bachchan and Abhishek Bachchan