Ganga kartik mela गंगा कार्तिक मेले में सड़कों पर किसानों की बोगियों का रैला, गंगा किनारे तंबुओं का डेरा

  •  गंगा कार्तिक मेला : सड़कों पर किसानों की बोगियों का रैला, गंगा किनारे तंबुओं का डेरा



  • अनिल मौर्य

    उत्तर प्रदेश की पश्चिमी दिशा में बहने वाली श्रद्धा की गंगा में स्नान को पवित्र आस्था से जुड़ा माना जाता है। हर माह अमावस्या और पूर्णिमा को लोग स्नान को पवित्र और पुण्य मानते है। इनमें दीवाली के बाद कार्तिक की पूर्णिमा का विशेष महत्व है। गंगा के उद्गम गंगोत्री से लेकर समुद्र में विलय तक के मार्ग में विभिन्न शहरों में गंगा में स्नान को अपनी आस्था के मुताबिक पुण्य माना जाता है। जगह  जगह मेले लगते हैं। यह हजारों सालों से समय के साथ तमाम बदलावों के साथ यूं ही जारी है।

इस बार कार्तिक पूर्णिमा के मेले पर गढ़मुक्तेश्वर और अन्य स्थानों पर कोरोना काल के बाद में बहुत उत्साह देखने को मिल रहा है।

यही कारण हैं कि बिना किसी रोक-टोक के रोके नहीं रुक रहे भैंसा-बोगी से जाने वाले श्रद्धालु। जिसको लेकर प्रदेश सरकार की पाबंदी भी धरी रह गई। केन्द्रीय राज्य मंत्री डा.संजीव बालियान को भी इस पाबंदी का विरोध करना पड़ा। जिससे पाबंदी लगाने वाले प्रदेश के पशुधन एवं दुग्ध विकास मंत्री को भी बेबसी का सामना करना पड़ गया। 

    स्वास्थ विभाग के पशुओं में लंपी संक्रमण को लेकर पहले ही हाथ-पैर फूले हैं। इन सबके बावजूद  गंगा किनारे श्रद्धालुओं का कार्तिक मेले के लिए जमावड़ा होने लगा हैं। जनपद हापुड़, गाजियाबाद, मेरठ (गढ़मुक्तेशवर, हस्तिनापुर), मुजफ्फरनगर (शुक्रताल), बागपत, शामली बिजनौर व सहारनपुर, कानपुर, बनारस आदि जनपद के श्रद्धालु गंगा किनारे दस्तक देकर तंबुओं का शहर बसा रहे हैं। साथ ही वे सभी बातों को दरकिनार कर भागीरथी में डूबकी लगाने के लिए तैयार हैं।प्रशासन चारों  ओर निगाहें जमाएं बैठा है और भैंसा-बोगी को लेकर श्रद्धा के आगे एक कदम पीछे हटने को विवश हैं।  प्रशासन सलामती की उम्मीदें बांधे हुए है।


लेखक :  राज्य कर्मचारियों के वरिष्ठ नेता है।




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