हरियाणा : भाजपा को दोबारा सत्ता, दुष्यंत को देवीलाल की विरासत और कांग्रेस को मिला विपक्ष का लाभकारी मौका



         मुबाहिसा : राजेन्द्र मौर्य      
रियाणा में भाजपा+जजपा की सरकार लगभग सभी निर्दलीयों के समर्थन के साथ बन चुकी है। मुख्यमंत्री के रूप में मनोहर लाल खट्टर दोबारा शपथ ले चुके हैं। इसके साथ ही खट्टर पहले एेसे गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बन गए हैं, जिन्होंने लगातार दूसरी बार शपथ ली है। भाजपा ने विधानसभा चुनाव 2019 में 40 सीटें जीतीं हैं जो बहुमत से छह सीटें कम हैं। जबकि 2014 में भाजपा ने 47 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। इस बार बहुमत से दूर रही भाजपा के नेताओं समेत खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात को लेकर खुश हैं कि भाजपा को 2014 में मिले 33.20 फीसदी  से इस बार तीन फीसदी अधिक वोट मिले हैं। लेकिन लोकसभा चुनाव -2019 में ही मिले 58.2 फीसदी से 22 फीसदी कम वोट मिलने के सवाल पर भाजपा नेता बगले झांक रहे हैं।
इस विधानसभा चुनाव में जाट बिरादरी और ताऊ देवीलाल की विरासत के असली हकदार के लिए इनेलो सुप्रीमो पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के दोनों पुत्र अजय चौटाला और अभय चौटाला आमने-सामने आए। जहां ओमप्रकाश चौटाला ने अभय चौटाला को अागे बढ़ाते हुए इनेलो की कमान सौंपी, वहीं बड़े बेटे अजय चौटाला और उनके सांसद बेटे दुष्यंत चौटाला को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। शायद जेल में रहते-रहते ओमप्रकाश चौटाला इस बात से बेखबर हो गए कि भारतीय सियासत में निरंतर बदलाव आ रहा है, उससे हरियाणा भी अछूता नहीं रह गया है। ओमप्रकाश चौटाला   समझते रहे कि अजय चौटाला तो उनके साथ जेल में है और इनेलो को अभय चौटाला ही चला रहे हैं तो ठीक वैसे ही उनकी इच्छानुसार अभय चौटाला उनकी विरासत संभाल लेंगे जैसे चौधरी देवीलाल के समय उन्होंने अपने अन्य भाइयों को दरकिनार कर चौधरी देवीलाल की विरासत को कब्जा लिया था। पर हुआ उल्टा, अजय चौटाला भले ही जेल में रहे लेकिन उनका बेटा दुष्यंत चौटाला सांसद रहते हुए प्रदेश भर में व्यवहार के चलते न केवल इनेलो के कर्मठ कार्यकर्ताओं बल्कि आम जाट बिरादरी में भी अपनी अच्छी पकड़ बना चुका था। वैसे भी हरियाणा में अजय चौटाला को "देवीलाल का विशेष स्नेह प्राप्त पौत्र" माना जाता रहा है। परिणामस्वरूप इनेलो से निकाले जाते ही दुष्यंत चौटाला और अजय चौटाला के समर्थन में जाट बिरादरी उठ खड़ी हुई। इनके द्वारा बनाई गई  जननायक जनता पार्टी को लोकसभा चुनाव में तो मोदी फैक्टर के चलते अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन विधानसभा चुनाव में जजपा अभय चौटाला  की इनेलो को धूल चटाते हुए 27 फीसदी वोटों के साथ 10 सीट जीतकर किंगमेकर की भूमिका में आ गई और 2014 में 24.11 फीसदी वोटों के साथ 19 सीटें जीतने वाली इनेलो इस चुनाव में मात्र 2.44 फीसदी वोट के साथ मात्र एक सीट पर सिमट कर रह गई। इसके साथ ही चौधरी देवीलाल के प्रपौत्र दुष्यंत चौटाला ने भाजपा से हाथ मिलाकर डिप्टी सीएम का पद भी हासिल कर लिया और इसके साथ तमाम शर्तों के साथ अपने भविष्य की राजनीति को सुरक्षित करने की कोशिश की है। 
देशभर में बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस को तमाम विपरीत परिस्थितियों में आपसी टकराव, मतभेद , खींचतान और आंतरिक कलह के बावजूद  हरियाणा की जनता ने समर्थन के साथ देश को भी सीधा संदेश देने का प्रयास किया है कि भाजपा को शिकस्त  देने का बूता केवल कांग्रेस में ही है। तब ही तो पार्टी की आंतरिक कलह खुलकर सड़कों पर आ जाने के बावजूद कांग्रेस को 28.13 फीसदी मतदाताओं ने वोट देकर 31 सीटें जिताई हैं, जबकि 2014 में कांग्रेस की भूपेंद्र हुड्डा सरकार को न केवल बेदखल कर दिया था बल्कि 20.58 फीसदी वोट के साथ मात्र 15 सीटों के साथ  तीसरे स्थान पर धकेल दिया था। इस चुनाव में जजपा के सत्ता में  शामिल होने से हरियाणा की जनता विशेष रूप से जाट वर्ग अपने को ठगा महसूस कर रहा है एेसे में कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे भूपेन्द्र हुड्डा को मुख्य विपक्षी दल के लिए अच्छा माहौल मिला है, जिसका वह बखूबी लाभ उठाएंगे। यह बात वह ओमप्रकाश चौटाला की 2004 तक रही सरकार के साथ ही अब मनोहरलाल खट्टर की सरकार के समय साबित कर चुके हैं बस अब उनको किए गए फ्रीहेंड को बरकरार रखने की जरूरत है, जिसको शायद कांग्रेस नेतृत्व विशेष रूप से सोनिया गांधी अच्छे से समझती हैं। काश अब यह बात राहुल गांधी समझ लें  तो हरियाणा में कांग्रेस बहुत मजबूत होकर उभरेगी।         

बसपा को किया बेदखल

हाल ही में बसपा लोकसभा चुनाव में सपा के कंधे पर यूपी में 10 लोकसभा सीटें जीतने के बाद हरियाणा को फतह करने की मंशा से निकली सुश्री मायावती  ने 87  विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए, लेकिन एक भी सफल नहीं हो पाया। जबकि 2014 में  बसपा  ने 04.79 फीसदी वोट लेकर एक सीट जीती थी। 

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