सियासत में नफरत की खेती से सावधान

आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान का वक्तव्य न केवल नफरत की आग में घी डालने का काम करेगा वहीं उन ताकतों को भी शक्ति देगा जो नफरत , वैमनस्य तथा अलगाव की ही राजनीति करते चले आ रहे हैं । हम यहां किसी को भी देशभक्ति अथवा राष्ट्रद्रोह का प्रमाण पत्र नही देना चाहेंगे अथवा किसी को भी पाकिस्तान भेजने की धमकी देने का वीसा , पर इतना जरूर है कि ऐसे वक्तव्य देश का माहौल खराब करने का काम करते हैं ।
     मेरा स्पष्ट मानना है कि मुस्लिम लीग कभी भी आज़ादी से पहले  भारतीय मुसलमानों की आधिकारिक प्रतिनिधि नही थी । संयुक्त पंजाब अथवा बंगाल तक मे जहाँ मुस्लिम बाहुल्य थे वहां भी 1946 के चुनावों में मुस्लिम लीग पराजित हुई थी । इन दोनों प्रान्तों के अतिरिक्त मुस्लिम लीग की कही तक भी मुसलमानो में कोई पैठ नही थी । मुसलमान थे अपने नेताओं बादशाह खान अब्दुल गफ्फार ,मौलाना आजाद ,डॉ अंसारी जैसे नेताओं के साथ । मुस्लिम लीग का पंजाब एवम बंगाल के नेतृत्व को छोड़ कर अन्य प्रान्तों की लीडरशिप भारत विभाजन के खिलाफ थी इसीलिए भारत के बाहुल्य मुसलमानो ने पाकिस्तान को नकार कर भारत मे ही रहना पसंद किया  ।
          मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन जो कि हैदराबाद तक ही अपना प्रभाव रखती है का राजनीतिक दर्जा बेशक आल इंडिया हो पर उनकी सोच बेहद कम प्रभाव की है । आज़ादी से पूर्व यह हैदराबाद रियासत सहित दक्षिण भारत के अनेक हिस्सों को जोड़ कर दक्षिणी पाकिस्तान बनाने का मंसूबा रखती थी परन्तु मुसलमानो का बड़ा हिस्सा इस विचार का विरोधी था जिस वजह से इस निज़ाम परस्त मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन को नकारा गया । बाद में इस ने भी भारत की एकता व संविधान को स्वीकार किया और आज इस पार्टी के एक सांसद मो0 ओवैसी है । उनके भी अनेक विवादित वक्तव्य परेशानी पैदा करते है । वैसे ऐसे ही बयानबाजी ऐसी सभी पार्टियों की खुराक है जो धुर्वीकरण होने पर जीवित रहती है ।
  वारिस पठान ,ओवैसी अथवा कुछ रंगीन दाढ़ी के तथाकथित मौलाना इस देश के देशभक्त मुस्लिम नागरिकों के प्रतिनिधि नही हो सकते है । ये सब सियासत के वे मोहरे है जो नफरत की आग पर ही अपनी रोटियां सेकते है । इनके नाम वारिस , ओवैसी ,ठाकुर , कटियार ,तोगड़िया  आदि -2  हो सकते है पर है ये एक ही थैली के चट्टे बट्टे ।
साभार : राम मोहन राय, अहमदाबाद

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