एक इतिहास यह भी बहादुर शाह जफर : मुल्क के लिए धूल में मिल गए लेकिन अंग्रेजों से नहीं मिले जब मुगलों ने पूरे भारत को एक किया तो इस देश का नाम कोई इस्लामिक नहीं बल्कि 'हिन्दुस्तान' रखा.. हाँलाकि इस्लामिक नाम भी रख सकते थे, कौन विरोध करता?? जिनको इलाहाबाद और फैजाबाद चुभता है वह समझ लें कि मुगलों के ही दौर में 'रामपुर' बना रहा तो 'सीतापुर' भी बना रहा. अयोध्या तो बसी ही मुगलों के दौर में. 'राम चरित मानस' भी मुगलिया काल में ही लिखी गयी. आज के वातावरण में मुगलों को सोचता हूँ, मुस्लिम शासकों को सोचता हूँ तो लगता है कि उन्होंने मुर्खता की. होशियार तो ग्वालियर का सिंधिया घराना, मैसूर का वाडियार घराना, जयपुर का राजशाही घराना, जोधपुर का राजघराना था. टीपू सुल्तान हों या बहादुरशाह ज़फर बेवकूफी कर गये और कोई चिथड़े-चिथड़ा हो गया तो किसी को देश की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई और सबके वंशज आज भीख माँग रहे हैं. अँग्रेजों से मिल जाते तो वह भी अपने महल बचा लेते और अपनी रियासतें बचा लेते, वाडियार, जोधपुर, सिंधिया और जयपुर राजघराने की तरह उनके भी वंशज आज ऐश करते, उनके भी बच्चे ...
" विविध विषयों को समेटे हुए बहुरंगी पुष्प गुच्छ है फार्मूला 44 की लघु कथाएं ।" डाक्टर पुष्पलता अधिवक्ता हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक सुपरिचित नाम हैं।वे एक प्रसिद्ध साहित्यकार हैं और अनेक सरकारी- गैर सरकारी उच्च स्तरीय सम्मानों से सम्मानित हो चुकी हैं। उनका लेखन साहित्य की अनेक विधाओं में है। उनके लेखन में निरंतरता है और इस कारण उनकी एक पत्रकार जैसी खोजी दृष्टि समाज में घटित सभी प्रकार की घटनाओं को अपने लेखन का विषय बना लेती है। उनकी अब तक लगभग 21 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें अनेक गीत संग्रह,तीन खण्ड काव्य, उपन्यास,बालगीत,बाल उपन्यास , सूफी टप्पे ,कहानी संग्रह व लघु कहानियों का संग्रह हैं। इस वर्ष उनकी नव प्रकाशित लघु कहानियों का संग्रह " फार्मूला -44 "मेरे हाथ में है। सर्व प्रथम कहानी संग्रह का शीर्षक ही पाठक को आकर्षित करता है पढ़ने के लिए।इस संग्रह में 41 कहानियाँ हैं जिनके विषय अपने आस-पास घटित सामान्य घटनाएं हैं जो प्रभावित करती हैं। कुछ कहानियों में संदेश है तो कुछ में साहित्य जगत में आपसी होड़ व आपाधापी का सजीव चित्रण ह...
लोकसभा चुनाव-2019 : भ्रम का जाल मुबाहिसा : राजेन्द्र मौर्य 2 018 समाप्त होते-होते एक साफ संदेश दे गया है कि 2012 में गुजरात जीत के साथ विजय रथ पर सवार हुए नरेंद्र मोदी का जादू अब समाप्त हो रहा है। देश में वोटों का दो धाराओं भाजपा और गैर भाजपा में धुर्वीकरण हो रहा है। इसको साफ तौर पर आरएसएस और भाजपा भी समझ रही है। सभी जानते हैं कि गैर भाजपा वोटों के धुर्वीकरण की ताकत के सामने भाजपा ठहर नहीं पाएगी। यह बात इस वर्ष के लोकसभा उपचुनावों के साथ ही हाल ही संपन्न हुए मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा की शिकस्त ने साबित की है। एेसे में नरेंद्र मोदी तमाम कोशिश के बावजूद दो तरफा जूझ रहे हैं। एक, वह आरएसएस संचालित भाजपा के गुप्त एजेंडे को नहीं रोक पा रहे हैं, जिससे उनकी महत्वाकांक्षी विश्व मान्य छवि बनाने के प्रयासों को भी धक्का लग रहा है। साथ ही अमित शाह व कुछेक उपकृत मंत्री और नेताओं के अलावा भाजपा नेतृत्व में ही एक बड़ा वर्ग उनसे नाराज है, जो नाराजगी को शायद सही वक्त आने के इंतजार में दबा...
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