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Bihar : पासवान की पहली पत्नी बोलीं, पारस ने चिराग को दिया धोखा

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पासवान की पहली पत्नी राजकुमारी बोलीं,  पारस ने चिराग को धोखा दिया है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में चिराग पासवान को जगह नहीं मिलने पर दिवंगत रामविलास पासवान की पहली पत्नी राजकुमारी ने कहा कि देवर पशुपति कुमार पारस ने गलत किया है। बिहार में खगड़िया जिले के शहर बन्नी गांव में दिवंगत रामविलास पासवान के पैतृक आवास पर उनकी पहली पत्नी राजकुमारी ने मीडिया से कहा कि रामविलास पासवान का असली वारिस चिराग पासवान है उसी को मोदी द्वारा अपनी कैबिनेट में मंत्री बनाया जाना चाहिए था। पारस ने सांसदों के साथ मिलकर चिराग को धोखा दिया है,  पार्टी को तोड़ने का गलत काम किया है। चिराग को आगे बढ़ाया जाना चाहिए, वह प्रदेश के युवाओं की पहली पसंद है। चिराग युवा है और प्रदेश के लिए बहुत कुछ करना चाहता है। दिवंगत  रामविलास पासवान की पहली पत्नी राजकुमारी देवी ने आज चिराग पासवान को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने पर पहली प्रतिक्रिया दी। उन्‍होंने कहा कि नरेंद्र मोदी को चिराग पासवान को मंत्रिमंडल में जगह देनी चाहिए। प्रधाानमंत्री पर उन्‍होंने काफी भरोसा है। चिराग ने हमेशा पीएम मोदी के कार्यों क...

Dalai Lama : दलाई लामा पूज्य हैं, माना मोदी ने

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दलाई लामा पूज्य हैं, माना मोदी ने के. विक्रम राव  मोदी सरकार अब कुछ बदली है। बल्कि तीन वर्षों बाद सुधरी है। हालांकि हर परिवर्तन को प्रगति नहीं कहते। भले ही प्रत्येक प्रगति परिवर्तन कहलाती हो। आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक ट्वीट किया। विश्ववंद्य, भगवान अवलोकितश्वर के अवतार, परम पावन दलाई लामा को उनके 86वीं वर्षगांठ (सात जुलाई) पर शतायु होने की कामना भेजी। निर्वासित तिब्बत सरकार के सिक्योंग (अध्यक्ष) लोबांग संगये ने बताया कि यह पहला अवसर है जब मोदीजी ने स्वयं दलाई लामा को ऐसा संदेशा प्रेषित किया।         अत: कूटनीति तथा मानवता के दरम्यान सुघड़ तालमेल समायोजित हुआ है। साथ ही विस्तारवादी लाल चीन को संदेशा भी मिल गया। सप्ताह भर की घटनाओं के परिवेश में यह गमनीय है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सदी पर मोदीजी ने एक शब्द भी न कहा, न लिखा। एकदम नजरंदाज कर दिया। कैसे लालसेना की लद्दाख में की गयी हिंसा बिसरायी जा सकती थी ? प्रधानमंत्री की ऐसी युक्ति बड़ी सूचक है। बोधक भी। इस बुद्धावतार लामा का मैं उपासक हूं। मेरे प्रेरक राममनोहर लोहिया उनके अथक समर्थक रहे। मेरे साथी ...

Pashupati Paras V/s Chirag Paswan "राम" ने नहीं सुनी "हनुमान" की प्रार्थना और चेतावनी

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 "राम" ने नहीं सुनी "हनुमान" की प्रार्थना और चेतावनी         मुबाहिसाः आर. के. मौर्य   बि हार विधानसभा चुनाव में और उसके बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को "राम" कहने वाले  खुद को उनका "हनुमान" मान बैठे लोकजनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान की उनके "राम" ने पशुपति पारस को मंत्री नहीं बनाए जाने के लिए की गई प्रार्थना को नहीं सुना और न ही उनके द्वारा कोर्ट जाने की चेतवानी को गंभीरता से लिया। ऐसे में दिवंगत रामविलास पासवान के जन्मदिन पांंच जुलाई को शुरू की गई आशीर्वाद यात्रा में उमड़े जनसैलाब भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दबाव के सामने असरदार साबित नहीं हो पाया और नतीजा, पशुपति पारस ने मोदी मंत्रीमंडल में कैबिनेट मंत्री की शपथ ग्रहण कर ली है। पांच जुलाई को  पटना पहुंचने पर चिराग पासवान के स्वागत में जनसैलाब उमड़ा और पशुपति पारस के कैंप में सन्नाटा छा गया था और हाजीपुर पहुंचते-पहुंचते आशीर्वाद यात्रा में जिस तरह से भीड़ बढ़ी, उससे माना जाने लगा था कि अब पशुपति पारस के कैंप का तंबू उखड़ चुका है और पशुपति पारस को...

Yogi : योगी भारी भोगी पर

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 योगी भारी भोगी पर! के. विक्रम राव यो गी आदित्यनाथजी ने उत्तर प्रदेश में अधुना दहशत और भय का माहौल सर्जाया है। ठिठुर रहे है कई लोग। मगर इसमें एक बड़ा अंतर है। मुख्यमंत्री की कर्मण्यता के कारण सिहरन उन लोगों में नहीं हो रही है जो सम्यक आचार करते हैं, नियम का पालन करते है। अहंकारभरे मनमानेपन से बाज आते हैं। छड़ी वहीं तक घुमाते है जहां दूसरे नागरिक की नाक की नोक आ जाती है। लाठी लिये भैंस हांकने वाले अब विलुप्त हो रहे है। पुरानी उक्ति को योगीजीने झुठला दिया है कि ''समरथ को नहीं दोष गोसांई।''        वस्तुत: कानून का भय और अनुशासन के राज की क्रमश: वापसी हो रही है। तनिक याद कर लें अमेरिका को सर्वाधिक जनप्रिय बत्तीसवें राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रुजवेल्ट (1933—1945) को। उन्होंने चार मौलिक स्वतंत्रता का प्रतिपादन किया था। अभिव्यक्ति और उपासना का हक तथा अभाव और भय से मुक्ति। मगर यूपी के माफियाओं ने उनके चौथे सिद्धांत (भय से उन्मुक्त) को ही अपना मौलिक अधिकार मान लिया, (freedom from fear)। योगीजी ने इस विशेषाधिकार के विकृत होने पर अब दुरुस्त कर दिया। माफियाओं की मांद रहे उत्तर प्...

CHIRAG PASWAN'S ASHIRWAD YATRA : आशीर्वाद यात्रा में 800 वाहनों का काफ़िला

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  आशीर्वाद यात्रा से पहले धरने पर बैठे चिराग, नहीं मिली अंबेडकर मूर्ति पर माल्यार्पण की इजाजत रा मविलास पासवान की पांच जुलाई को जयंती है. इस मौके पर उनके बेटे और लोक जनशक्ति पार्टी के सांसद चिराग पासवान आशीर्वाद यात्रा शुरू करने जा रहे हैं। बिहार में एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई हैं. आज (5 जुलाई) पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की जयंती है. इस मौके पर उनके बेटे और लोक जनशक्ति पार्टी के सांसद चिराग पासवान आशीर्वाद यात्रा शुरू करने जा रहे हैं. यात्रा शुरू होने से पहले ही विवाद हो गया है. पटना में अंबेडकर मूर्ति पर माल्यार्पण की इजाजत न मिलने को लेकर चिराग पासवान धरने पर बैठ गए हैं। चिराग पासवान की आशीर्वाद यात्रा में  800 से अधिक गाड़ियों का काफिला दिवंगत दलित नेता स्वर्गीय पिता राम विलास पासवान के जन्मदिन पर लोजपा सांसद चिराग पासवान ने पूर्व घोषित कार्यक्रम के तहत हाजीपुर की धरती को नमन करते हुए आशीर्वाद यात्रा का शुभारंभ किया। चिराग को दोपहर के 2:30 बजे हाजीपुर कार्यक्रम स्थल पर पहुंचना था, लेकिन निर्धारित समय से 2 घंटा लेट वे पासवान चौक के कर...

CHAUTALA with Farmers Protest : ओमप्रकाश चौटाला जेल से रिहा, मिलेंगे आंदोलनकारी किसानों से

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 ओमप्रकाश चौटाला जेल से रिहा, मिलेंगे आंदोलनकारी किसानों से ह रियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला सजा पूरी होने के बाद जेल से रिहा होकर घर आ गए हैं। जेल से बाहर आते ही चौटाला ने घोषणा की है कि वह दिल्ली बार्डर पर कृषि सुधार कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे किसानों से मिलने के ल‌िए जाएंगे। हालांकि उनकी इस घोषणा से आंदोलनकारी किसान संगठनों के नेताओं के सामने यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या ओमप्रकाश चौटाला को मंच पर बैठाया जाएगा ? चूंकि अभी तक जो भी धरना स्थल पर नेता पहुंचे हैं, उनको आंदोलनकारी संगठनों के नेताओं ने मंच पर नहीं जाने दिया है। सभी नेताओं को नीचे से ही बिना संबोधन के लौटना पड़ा है। माना यह जा रहा है कि ओमप्रकाश चौटाला बड़े किसान और जाट नेता हैं, ऐसे में उनको मंच पर न जाने देने से कहीं उल्टा संदेश न चला जाए, इस कारण आंदोलनकारी उनको मंच पर ले जा सकने के बारे में सोच सकते हैं। हालांकि अभी इस बारे में किसी भी संगठन नेता का कोई बयान नहीं आया है। भाकियू के संस्थापक अध्यक्ष चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने भी कई अवसरों पर बड़े राजनीतिक दलों के नेताओं का मंच स...

Rakesh Tikait's AC Camp : धरती थी टिकैत का बिछौना और ट्राली छत

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चौधरी महेंद्र टिकैत से मेल नहीं खाती राकेश की जीवन शैली मुबाहिसा:  आर. के. मौर्य भा रतीय किसान यूनियन के संस्थापक अध्यक्ष चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत के पहले देश को हिला देने वाले 1987 के आंदोलन से लेकर उनके निधन तक मैंने उनके मेरठ, दिल्ली समेत तमाम आंदोलन देखे और कवर भी किए। उनकी कई बार हुई गिरफ्तारी से लेकर बसपा शासन काल में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती पर अभद्र टिप्पणी करने पर टिकैत को गिरफ्तार करने पहुंची पुलिस को रोकने के लिए सिसौली की किलेबंदी को नजदीक से देखा और तमाम आंदोलनों, पंचायतों व महापंचायतों को खूब कवर भी किया। उनकी सादगी ने हमेशा मुझे काफी प्रभावित किया। वह इतने बड़े किसान नेता होते हुए भी सिसौली में हमेशा तड़के ही अपने खेत और खलिहान में फावड़ा चलाते देखे जाते थे। मैंने उनको कभी एसी में सोते हुए नहीं देखा, उनकी झलक हालांकि उनके बड़े पुत्र और मौजूदा भाकियू सुप्रीमो नरेश टिकैत में देखने को मिलती है, जबकि राकेश टिकैत की जीवन शैली कहीं चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत क...

CHINA AND INIDA : चीन और भारत ! कितनी विषमता !!

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 चीन और भारत! कितनी विषमता !! के. विक्रम राव   क म्युनिस्ट साम्राज्य चीन के मार्क्सवादी सुलतान शी जिनपिंग ने सवा करोड़ सदस्योंवाली कम्युनिस्ट पार्टी की शताब्दी पर परसों ( जुलाई 1) मानवता को धमकी दी है। ''संभलो वर्ना, (बकौल लखनवी अंदाज के) खोपड़ा फोड़ देंगे। तुम्हारा लहू बहा देंगे।'' तो दुनिया तो आतंकित होगी ही। कौन है ये शी जिनपिंग? माओ जोडोंग की लाल सेना के सैनिक शी भोंगजून ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनका बेटा युवान वंश के शासक महाबलवान शीजू खान उर्फ कुबलई खान (चंगेज का पोता) से भी अधिक शक्तिशाली हो जायेगा। शी जिनपिंग अपने संबोधन में पश्चिमी राष्ट्रों के अलावा शायद मोदी के भारत को भी चेताना चाहते थे। लद्दाख  में भारतीय जाबाजों ने लाल सेना को खदेड़ा तो उसका दर्द झलकेगा ही। पश्चिम की ताकत से लोहा लेना सुगम है, मगर प्राच्य (भारत) की बौद्धिक विशिष्टता के सामने हीन भावना से पार पाना कठिन होगा।         लालचीन में श्रमिक बंधुआ मात्र कामगार है। बेजुबान है। भारत में श्रमिक तो यूनियन बना कर पूंजी को ललकारता हैं। यही बुनियादी अंतर है। वहां छटनी होती है, तब भी द...

Odisha Journalist Dr. Jimut Mangaraj dies in road mishap

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Utkal Journalists Association (IFWJ), Odisha, president Dr. Jimut Mangaraj dies in road mishap BHUBANESWAR : The president of the Utkal Journalists Association (IFWJ), Dr. Jimut Mangaraj, died yesterday in a road accident near Bhubaneswar. He was 64 and is survived by a daughter and son. His wife had died earlier. A senior media person, he was running his own television news channel. Dr. Mangaraj, who had a Ph.D. in mass communication, started his career with the Press Trust of India (PTI) 1981. He joined the English daily the Sun Times but returned to Oriya media, joining the Samvad daily. He was with the famous daily the Prajatantra, founded and edited by “Utakal Kesari” late Dr. Harekrushna Mahtab, a Gandhia freedom-fighter and Orissa chief minister. His son Dr. Bharthruhari Mahtab, BJD M.P., now edits it. Dr. Mangaraj edited his own journal the Lifeline, devoted to health and medical matters. He was also the principal of the Biju Patnaik College of Journalism. He...

SANJAY GANDHI : संजय गांधी, जिसकी छवि विलेन की बनाई गई

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संजय गांधी की सोच अच्छी, छवि विलेन की  मुबाहिसाः आर.के. मौर्य     मैं उस समय मात्र नौ वर्ष का था, लेकिन घर का राजनीतिक परिवेश होने के कारण पिता के साथ जागरूक रहता था और हर छोटी-बड़ी गतिविधि के साथ ही पिता के साथ नेताओं की परिचर्चा सुनता था। उन दिनों आपातकाल था, मेरे नगर में भी हर रोज जुलूस के रूप में नसबंदी कराने के ल‌िए लोगों को जाते देखता था। साथ ही अतिक्रमण पर हथोड़े चलते देखता था। जगह-जगह युवाओं की टोलियों को पौधारोपण करते देखते थे। दुकानों पर हर वस्तु के रेट लिखे होते थे। साप्ताहिक बंदी के दिन बाजारों में कर्फ्यू  जैसा माहौल होता था। गैर कांग्रेसी दलों के नेता गिरफ्तार किए जा चुके थे। हर ओर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके सुपुत्र संजय गांधी को लेकर चर्चा और खौफ का माहौल था। इसी दौरान चुनाव की घोषणा हुई। देखते ही देखते चुनाव में इंदिरा गांधी को भारी शिकस्त का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी की सरकार बनी, प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई बन गए। देश के सभी नामचीन गैर कांग्रेस दलों के नेता मंत्री बन चुके थे। इं...

P.V. NARASIMHA RAO: प्रधानमंत्री, जिसने भारत बचाया

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एक पीएम, जिसने भारत बचाया ! के. विक्रम राव    पी वी नरसिम्हा राव की आज (28 जून) जन्मशती है। गमनीय है कि पाँच वर्ष तक अल्पमतवाली कांग्रेस सरकार को चलानेवाले नरसिम्हा राव ने दस जनपथ के इशारे पर थिरकने से इनकार कर दिया था| हालांकि सरदार मनमोहन सिंह सोनिया गांधी की उँगलियों पर दस वर्ष तक भांगड़ा करते रहे| ऐसे इतिहास-पुरुष के जन्मोत्सव से पार्टी मुखिया राहुल गांधी को कोई सरोकार भी नहीं है| विडम्बना तो यह थी कि उनके सगे काका (संजय गांधी) जो कभी भी किसी भी राजपद पर नहीं रहे, की समाधि राजघाट परिसर में बनी| केवल पांच महीने रहे प्रधान मंत्री, जो लोकसभा में बैठे ही नहीं, (चरण सिंह) के लिये किसान घाट बन गया| सात माह राजीव–कांग्रेस की बैसाखी पर प्रधान मंत्री पद कब्जियाये ठाकुर चंद्रशेखर सिंह का भी एकता स्थल पर अंतिम संस्कार किया गया| मगर सम्पूर्ण पांच साल की अवधि तक प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिम्हा राव का शव सोनिया गांधी ने सीधे हैदराबाद रवाना करा दिया था| दिल्ली में उनके नाम कोई स्मारक नहीं, कोई गली नहीं|        कल्पना कीजिए कि ताशकन्द में अकाल मृत्यु (1966)...

mirror of society : समाज का आईना है "फीका लड्डू"

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समाज का आईना है "फीका लड्डू"  वरिष्ठ साहित्यकारों ने की डॉ पुष्पलता की पुस्तक  फीका लड्डू की समीक्षा"  समीक्षक एवं संपादक साहित्यकार डॉ अलका वशिष्ठ ने कहा ,  तीन बार पढ़ चुकी हूँ कहानी, बहुत सारे भाव विचार और प्रश्न उमड़ रहे हैं। यह दाम्पत्य जीवन की कड़वी सच्चाई है। आकर्षण दैहिक हो या मानसिक यदि एकतरफा हो तो बिखराव बना रहता है। ना जाने कितने दम्पति इस त्रासद अवस्था को झेल रहे हैं।  समाज का आईना है ये कहानी।  कहावत भी है शादी ऐसा लड्डू है,जो खाए वो पछताए,ना खाए वो भी । इस कहानी ने दिमाग में हलचल मचा दी है।  हिंदुस्तान  के सम्पादक सूर्यकांत द्विवेदी  ने कहा बहुत ही सुंदर कहानी है। अद्यतन पढ़ता चला गया। बाकमाल। बड़ा पेड़ पौधे को नहीं पनपने देता। जीवन के अंतर्द्वंद्व को बहुत सुंदरता से आपने लिखा है।  यशपाल सिंह  संपादक   "जनवाणी"ने कहा यथार्थ उतारा है कागजों पर ।  वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक डॉ राम गोपाल भारतीय ने कहा ,कथाकार डॉ पुष्पलता की कहानी फीका लड्डू गृहस्थ जीवन में पल- पल बदलते  काल्पनिक और यथार्थपूर्ण मनोभावों क...

Pressure on Press : प्रेस पर प्रेशर कितना ?, तब और अब !

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प्रेस पर प्रेशर कितना ? तब और अब ! के. विक्रम राव           कई दफा सुना। बहुत बार पढ़ा भी। अब मितली सी होने लगती है। वितृष्णा और जुगुप्सा भी। कथित जनवादी, प्रगतिशालि, अर्थात वामपंथी और सोनिया—कांग्रेसी दोहराते रहते है, चीखते भी हैं कि आज आपातकाल से भी बदतर स्थिति हो गयी है। अत: तार्किक होगा कि खूंखार टीवी एंकर, खोजी खबरिये और जुझारु—मीडियाकर्मियों की तब (25 जून 1975 से 21 मार्च 1977) और आज की कार्यशैली की तनिक तुलना करें।          मसलन आपातकाल जैसी लोमहर्षक वारदातें यदि आज होतीं, तो वर्तमान मीडिया क्या सत्तावानों के, पुलिसवालों के, राजनेताओं के, समाज के कर्णधारों के परखमें और पुर्जें नहीं उड़ा देते? अत्याचारियों की धज्जियां ढूंढे नहीं मिलती। तो इन पुराने हैवानी हादसों पर गौर करें। दो घटनाओं का उल्लेख करें। आपातकाल में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डा. रघुवंश को नजरबंद कर जेल में सड़ाया गया। उनपर इल्जाम लगा था कि वे खंभे पर चढ़कर संचार के तार काट रहे थे। डा. रघुवंश जन्मजात लुंज थे। वे बाल्यावस्था से ही अपने पैरों की उंगलियों के बल लि...